संपादन : सन्नी दूबे

अक्सर आप अस्पतालों में डाक्टरों को तिमारदारों में झड़प देखते आए हो और लोगों की तरफ से इसका मुख्य कारण सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की तरफ से मरीजों के प्रति लापरवाही बताई जाती है! इसी संबंधित केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत डॉक्टरों की प्राइवेट प्रेक्टिस पर सरकार प्रतिबंध लगा सकती है। उच्च न्यायालय के निर्देश पर मेडिकल विशेषज्ञों की कमेटी गठित की गई थी जिसने अपनी सिफारिशों में मरीजों की देखभाल के हितों को देखते हुए जम्मू कश्मीर में डॉक्टरों की प्राइवेट प्रेक्टिस पर प्रतिबंध लगाए जाने की सिफारिश की है।
इस मामलें में स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार केंद्र शासित प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत डाक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं जिस कारण मरीजों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कुछ दिनों के बाद इस संबंध में बैठक होगी जिसमें इस मुद्दे पर विचार-विमर्श किया जाएगा। विशेषज्ञों ने कहा है कि बड़ी संख्या में डॉक्टर अच्छा वेतन पाने के बावजूद प्राइवेट प्रेक्टिस करते हैं और ये डाक्टर उन बेरोजगार डॉक्टरों का हिस्सा ले जाते हैं जो प्राइवेट प्रेक्टिस नहीं करते और न ही उनको सरकारी नौकरी मिली है। इसलिए इन डाक्टरों को नौकरियों की तलाश में बाहरी राज्यों का रुख करना पड़ता है।
इसके साथ ही डॉक्टरों की मुख्य दिलचस्पी प्राइवेट प्रेक्टिस में रहती है जिस कारण मेडिकल कॉलेजों में मरीजों को सही चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती। एक अन्य विशेषज्ञ के अनुसार मरीजों की देखभाल सही तरीके से तब हो सकती है जब सरकार प्राइवेट प्रेक्टिस पर प्रतिबंध लगा दे। प्राइवेट प्रेक्टिस पर प्रतिबंध से प्राइवेट क्लीनिक और कारपोरेट अस्पतालों के स्थापित होने को बल मिलेगा और दूरदराज के इलाकों में भी मरीजों को बेहतर सुविधाएं मिल पाएंगी। इसके साथ ही विशेषज्ञ के अनुसार मेडिकल कॉलेज अस्पताल में डॉक्टर सप्ताह में दो-तीन आपरेशन औसतन करते हैं और वही डॉक्टर प्राइवेट नर्सिंग होम में कुछ ही घंटों में 8-10 ऑपरेशन करते हैं। प्राइवेट अस्पतालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है और इसमें सरकारी डॉक्टर प्रेक्टिस कर रहे हैं। ऐसा सब होने के बाद सरकारी डाक्टरों पर बोझ भी बढ़ रहा है जिससे वे मरीजों को पर्याप्त चिकित्सा सेवा नहीं दे पाते।
इस खबर के बाद डाक्टर एसोसिएशन के प्रधान डा. निसार उल हसन का कहना है कि अधिकतर डाक्टर अपना समय प्राइवेट अस्तपालों में लगाते है व मेडिकल एजुकेशन व रिसर्च में समय नहीं दे पाते है। ऐसा करने के बाद आम मरीज पिसते हैं। इसकी गंभीरता को देखते हुए प्राइवेट व सरकार सेक्टर को अलग अलग होना चाहिए। जो सरकारी डाकटर है उन्हें सिर्फ अस्पतालों में ही सेवाएं देनी चाहिए।

 

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